सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः ।
अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः ।
दैवतान्यपि स क्रोधात्स्रष्टुं समुपचक्रमे ॥
सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः ।
अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः ।
दैवतान्यपि स क्रोधात्स्रष्टुं समुपचक्रमे ॥
अन्वयः
नक्षत्रवंशं च system of stars, सृष्टवा having created, क्रोधेन out of wrath, कलुषीकृत: having his vision blurred, अन्यम् another, इन्द्रं Indra, करिष्यामि I will create, लोक: this world, अनिन्द्रक: वा स्यात् or will be without Indra (saying so), स: he दैवतान्यपि even devatas, क्रोधात् with anger, स्रष्टुम् to create, समुपचक्रमे commenced.Summary
Having created a constellation of stars, Viswamitra out of anger said, "I will create another Indra or this world will be without Indra" and commenced to create even gods.पदच्छेदः
| सृष्ट्वा | सृष्ट्वा (√सृज् + क्त्वा) |
| नक्षत्रवंशं | नक्षत्र–वंश (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| क्रोधेन | क्रोध (३.१) |
| कलुषीकृतः | कलुषीकृत (√कलुषी-कृ + क्त, १.१) |
| अन्यम् | अन्य (२.१) |
| इन्द्रं | इन्द्र (२.१) |
| करिष्यामि | करिष्यामि (√कृ लृट् उ.पु. ) |
| लोको | लोक (१.१) |
| वा | वा (अव्ययः) |
| स्याद् | स्यात् (√अस् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| अनिन्द्रकः | अनिन्द्रक (१.१) |
| दैवतान्य् | दैवत (२.३) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| स | तद् (१.१) |
| क्रोधात् | क्रोध (५.१) |
| स्रष्टुं | स्रष्टुम् (√सृज् + तुमुन्) |
| समुपचक्रमे | समुपचक्रमे (√समुप-क्रम् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सृ | ष्ट्वा | न | क्ष | त्र | वं | शं | च | क्रो | धे | न | क |
| लु | षी | कृ | तः | अ | न्य | मि | न्द्रं | क | रि | ष्या | मि |
| लो | को | वा | स्या | द | नि | न्द्र | कः | दै | व | ता | न्य |
| पि | स | क्रो | धा | त्स्र | ष्टुं | स | मु | प | च | क्र | मे |