अन्वयः
मुनिपुङ्गव: preeminent among ascetics, तेषां सर्वेषाम् all their, तत् वचनम् those words, श्रुत्वा having heard, क्रोधसंरक्तनयन: with eyes reddened with anger, सरोषम् with fury, इदम् this word, अब्रवीत् spoke.
Summary
Having listened to the words of the elephant, Anshuman started enquring the well being of each of the guardians (elephants) of the quarters successively with due respect:
पदच्छेदः
| तेषां | तद् (६.३) |
| तद् | तद् (२.१) |
| वचनं | वचन (२.१) |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| पुत्राणां | पुत्र (६.३) |
| मुनिपुंगवः | मुनि–पुंगव (१.१) |
| क्रोधसंरक्तनयनो | क्रोध–संरक्त (√सम्-रञ्ज् + क्त)–नयन (१.१) |
| व्याहर्तुम् | व्याहर्तुम् (√व्या-हृ + तुमुन्) |
| उपचक्रमे | उपचक्रमे (√उप-क्रम् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ते | षां | त | द्व | च | नं | श्रु | त्वा |
| पु | त्रा | णां | मु | नि | पुं | ग | वः |
| क्रो | ध | सं | र | क्त | न | य | नो |
| व्या | ह | र्तु | मु | प | च | क्र | मे |