तान्दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत ।
असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः ।
किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति ॥
तान्दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत ।
असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः ।
किमिदं हृदयोत्कम्पि मनो मम विषीदति ॥
अन्वयः
घोरा: freightening, पक्षिण: birds, असौम्या: are disagreeable, मृगाश्चापि deers also, प्रदक्षिणा: on to their right, हृदयोत्कम्पि trembling my heart, इदम् this, किम् what, मम my, मन: mind, विषीदति depressed of spirits.Summary
"While the frightening birds are inauspicious, the deer on the right are favourables Why is this? My heart beats. My mind is depressed.पदच्छेदः
| तान् | तद् (२.३) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| राजशार्दूलो | राजन्–शार्दूल (१.१) |
| वसिष्ठं | वसिष्ठ (२.१) |
| पर्यपृच्छत | पर्यपृच्छत (√परि-प्रच्छ् लङ् प्र.पु. एक.) |
| असौम्याः | असौम्य (१.३) |
| पक्षिणो | पक्षिन् (१.३) |
| घोरा | घोर (१.३) |
| मृगाश् | मृग (१.३) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| प्रदक्षिणाः | प्रदक्षिण (१.३) |
| किम् | क (१.१) |
| इदं | इदम् (१.१) |
| हृदयोत्कम्पि | हृदय–उत्कम्पिन् (१.१) |
| मनो | मनस् (१.१) |
| मम | मद् (६.१) |
| विषीदति | विषीदति (√वि-सद् लट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | न्दृ | ष्ट्वा | रा | ज | शा | र्दू | लो | व | सि | ष्ठं | प |
| र्य | पृ | च्छ | त | अ | सौ | म्याः | प | क्षि | णो | घो | रा |
| मृ | गा | श्चा | पि | प्र | द | क्षि | णाः | कि | मि | दं | हृ |
| द | यो | त्क | म्पि | म | नो | म | म | वि | षी | द | ति |