अन्वयः
अग्निम् firegod, यशस्विनम् enowned, पितरम् च his father also, शुश्रूषमाणस्य while attending, एवम् in this manner, वर्तमानस्य living, तस्य for him, काल: time, समभिवर्तत will be spent.
Summary
Worshipping the firegod and attending on his renowned father, he will spend a long time living in this manner (practising vratitva mode of brahmacharya).
पदच्छेदः
| तस्यैवं | तद् (६.१)–एवम् (अव्ययः) |
| वर्तमानस्य | वर्तमान (√वृत् + शानच्, ६.१) |
| कालः | काल (१.१) |
| समभिवर्तत | समभिवर्तत (√समभि-वृत् लङ् प्र.पु. एक.) |
| अग्निं | अग्नि (२.१) |
| शुश्रूषमाणस्य | शुश्रूषमाण (√शुश्रूष् + शानच्, ६.१) |
| पितरं | पितृ (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| यशस्विनम् | यशस्विन् (२.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | स्यै | वं | व | र्त | मा | न | स्य |
| का | लः | स | म | भि | व | र्त | त |
| अ | ग्निं | शु | श्रू | ष | मा | ण | स्य |
| पि | त | रं | च | य | श | स्वि | नम् |