अन्वयः
सः त्वम् such as you, सर्वलोकनिदर्शिनीम् that serves as an instance to all, सतां बुद्धिम् judgement of the wise, पुरस्कृत्य treating with honour, भरतेन by Bharata, प्रसादितः pleased by, राज्यम् kingdom, प्रतिगृह्णीष्व accept.
Summary
Honour the decision of the wise that serves as an instance to all and accept the kingdom offered by Bharata with pleasureइत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे अष्टोत्तरशततमस्सर्गः॥Thus ends the one hundredeighth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.
पदच्छेदः
| सतां | सत् (६.३) |
| बुद्धिं | बुद्धि (२.१) |
| पुरस्कृत्य | पुरस्कृत्य (√पुरस्-कृ + ल्यप्) |
| सर्वलोकनिदर्शिनीम् | सर्व–लोक–निदर्शिन् (२.१) |
| राज्यं | राज्य (२.१) |
| त्वं | त्वद् (१.१) |
| प्रतिगृह्णीष्व | प्रतिगृह्णीष्व (√प्रति-ग्रह् लोट् म.पु. ) |
| भरतेन | भरत (३.१) |
| प्रसादितः | प्रसादित (√प्र-सादय् + क्त, १.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| स | तां | बु | द्धिं | पु | र | स्कृ | त्य |
| स | र्व | लो | क | नि | द | र्शि | नीम् |
| रा | ज्यं | त्वं | प्र | ति | गृ | ह्णी | ष्व |
| भ | र | ते | न | प्र | सा | दि | तः |