अन्वयः
पार्थिवात्मज O king's son, महार्हान् inestimable, राजभोगान् royal plesures, अनुभवन् enjoying, त्वम् you, शक्रः Indra, त्रिविष्ठपे यथा like in heaven, अयोध्यायाम् in Ayodhya, विहर enjoy.
Summary
O king's son, enjoy inestimable royal pleasures in the city of Ayodhya like Indra in heaven.
पदच्छेदः
| राजभोगान् | राजन्–भोग (२.३) |
| अनुभवन् | अनुभवत् (√अनु-भू + शतृ, १.१) |
| महार्हान् | महार्ह (२.३) |
| पार्थिवात्मज | पार्थिव–आत्मज (८.१) |
| विहर | विहर (√वि-हृ लोट् म.पु. ) |
| त्वम् | त्वद् (१.१) |
| अयोध्यायां | अयोध्या (७.१) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| शक्रस् | शक्र (१.१) |
| त्रिविष्टपे | त्रिविष्टप (७.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| रा | ज | भो | गा | न | नु | भ | व |
| न्म | हा | र्हा | न्पा | र्थि | वा | त्म | ज |
| वि | ह | र | त्व | म | यो | ध्या | यां |
| य | था | श | क्र | स्त्रि | वि | ष्ट | पे |