अन्वयः
अन्तर्हिताः remaining invisible, मुनिगणाः hosts of sages, सिद्धाश्च siddhas, परमर्षय: devarshis, महात्मानौ magnanimous, भ्रातरौ brothers, तौ those two, काकुत्स्थौ Kakutsthas, प्रशशंसिरे lauded.
Summary
The hosts of sages, siddhas and devarshis watching invisible the two Kakutstha brothers extoled them.
पदच्छेदः
| अन्तर्हितास् | अन्तर्हित (√अन्तः-धा + क्त, १.३) |
| त्व् | तु (अव्ययः) |
| ऋषिगणाः | ऋषि–गण (१.३) |
| सिद्धाश् | सिद्ध (१.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| परमर्षयः | परम–ऋषि (१.३) |
| तौ | तद् (२.२) |
| भ्रातरौ | भ्रातृ (२.२) |
| महात्मानौ | महात्मन् (२.२) |
| काकुत्स्थौ | काकुत्स्थ (२.२) |
| प्रशशंसिरे | प्रशशंसिरे (√प्र-शंस् लिट् प्र.पु. बहु.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| अ | न्त | र्हि | ता | स्त्वृ | षि | ग | णाः |
| सि | द्धा | श्च | प | र | म | र्ष | यः |
| तौ | भ्रा | त | रौ | म | हा | त्मा | नौ |
| का | कु | त्स्थौ | प्र | श | शं | सि | रे |