अथानुपूर्व्यात्प्रतिपूज्य तं जनं; गुरूंश्च मन्त्रिप्रकृतीस्तथानुजौ ।
व्यसर्जयद्राघववंशवर्धनः; स्थितः स्वधर्मे हिमवानिवाचलः ॥
अथानुपूर्व्यात्प्रतिपूज्य तं जनं; गुरूंश्च मन्त्रिप्रकृतीस्तथानुजौ ।
व्यसर्जयद्राघववंशवर्धनः; स्थितः स्वधर्मे हिमवानिवाचलः ॥
अन्वयः
अथ thereafter, राघववंशवर्धनः one who enhances the progeny of the Raghu dynasty, स्वधर्मे in his code of righteousness, हिमवान् Himavat, अचलः इव like the unshakable mountain, स्थिरः firm, तं जनम् those people, अनुपूर्व्या in accordance with their rank, प्रतिनन्द्य having greeted, गुरूंश्च to preceptors, मन्त्रिप्रकृतीः ministers and subjects, तथा like that, अनुजौ wishing his younger brothers Bharata and Satrughna, व्यसर्जयत् sent them forth.Summary
Inflexibly fixed in his own code of righteouness, like the Himavat mountain, Rama, the enhancer of the progeny of the Raghu dynasty, paid respect due to the preceptors, ministers and subjects in accordance with their rank, blessed his younger brothers, Bharata and Satrughna and sent them forth.पदच्छेदः
| अथानुपूर्व्यात् | अथ (अव्ययः)–आनुपूर्व्य (५.१) |
| प्रतिपूज्य | प्रतिपूज्य (√प्रति-पूजय् + ल्यप्) |
| तं | तद् (२.१) |
| जनं | जन (२.१) |
| गुरूंश् | गुरु (२.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| मन्त्रिप्रकृतीस् | मन्त्रिन्–प्रकृति (२.३) |
| तथानुजौ | तथा (अव्ययः)–अनुज (२.२) |
| व्यसर्जयद् | व्यसर्जयत् (√वि-सर्जय् लङ् प्र.पु. एक.) |
| राघववंशवर्धनः | राघव–वंश–वर्धन (१.१) |
| स्थितः | स्थित (√स्था + क्त, १.१) |
| स्वधर्मे | स्वधर्म (७.१) |
| हिमवान् | हिमवन्त् (१.१) |
| इवाचलः | इव (अव्ययः)–अचल (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | नु | पू | र्व्या | त्प्र | ति | पू | ज्य | तं | ज | नं |
| गु | रूं | श्च | म | न्त्रि | प्र | कृ | ती | स्त | था | नु | जौ |
| व्य | स | र्ज | य | द्रा | घ | व | वं | श | व | र्ध | नः |
| स्थि | तः | स्व | ध | र्मे | हि | म | वा | नि | वा | च | लः |
| ज | त | ज | र | ||||||||