ततः पुरस्तात्सहसा विनिर्गतो; महीपतीन्द्वारगतान्विलोकयन् ।
ददर्श पौरान्विविधान्महाधना;नुपस्थितान्द्वारमुपेत्य विष्ठितान् ॥
ततः पुरस्तात्सहसा विनिर्गतो; महीपतीन्द्वारगतान्विलोकयन् ।
ददर्श पौरान्विविधान्महाधना;नुपस्थितान्द्वारमुपेत्य विष्ठितान् ॥
अन्वयः
ततः then, सहसा immediately, पुरस्तात् forward, विनिर्गतः moving, द्वारगतः having reached the gate, विलोकयन् seeing, द्वारम् gate, उपेत्य having approached, विष्ठितान् waiting, महीपतीन् kings, उपस्थितान् having arrived, महाधनान् wealthy people, (विविधान्) पौरान् citizens, ददर्श beheld.M N Dutt
Having come out of the presence of the king suddenly, he saw the warders, various citizens and great personages sitting at the gate.Summary
Then Sumantra hastened towards the gate where he saw kings, wealthy people and citizens who had already arrived and waiting there. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे चतुर्दशस्सर्गः॥Thus ends the fourteenth sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| पुरस्तात् | पुरस्तात् (अव्ययः) |
| सहसा | सहसा (अव्ययः) |
| विनिर्गतो | विनिर्गत (√विनिः-गम् + क्त, १.१) |
| महीपतीन् | महीपति (२.३) |
| द्वारगतान् | द्वार–गत (√गम् + क्त, २.३) |
| विलोकयन् | विलोकयत् (√वि-लोकय् + शतृ, १.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| पौरान् | पौर (२.३) |
| विविधान् | विविध (२.३) |
| महाधनान् | महाधन (२.३) |
| उपस्थितान् | उपस्थित (√उप-स्था + क्त, २.३) |
| द्वारम् | द्वार (२.१) |
| उपेत्य | उपेत्य (√उप-इ + ल्यप्) |
| विष्ठितान् | विष्ठित (√वि-स्था + क्त, २.३) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | पु | र | स्ता | त्स | ह | सा | वि | नि | र्ग | तो |
| म | ही | प | ती | न्द्वा | र | ग | ता | न्वि | लो | क | यन् |
| द | द | र्श | पौ | रा | न्वि | वि | धा | न्म | हा | ध | ना |
| नु | प | स्थि | ता | न्द्वा | र | मु | पे | त्य | वि | ष्ठि | तान् |
| ज | त | ज | र | ||||||||