स राघवस्तत्र कथाप्रलापं; शुश्राव लोकस्य समागतस्य ।
आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः; प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य ॥
स राघवस्तत्र कथाप्रलापं; शुश्राव लोकस्य समागतस्य ।
आत्माधिकारा विविधाश्च वाचः; प्रहृष्टरूपस्य पुरे जनस्य ॥
अन्वयः
तदा then, सः that, राघवः Rama, तत्र there, समागतस्य having assembled, लोकस्य people's, कथा प्रपञ्चान् words of praise, शुश्राव heard, प्रहृष्टरूपस्य great rejoicings, पुरोजनस्य citizens, आत्माधिकाराः concerning himself, विविधाः different, वाचः च words (heard).M N Dutt
Rāghava then heard the people coming from different quarters and the well-pleased citizens, talking amongst themselves regarding him in the following strain.Summary
Rama heard these various words of admiration by people who had assembled there, and (witnessed) the rejoicings of the citizens.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| राघवस् | राघव (१.१) |
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| कथाप्रलापं | कथा–प्रलाप (२.१) |
| शुश्राव | शुश्राव (√श्रु लिट् प्र.पु. एक.) |
| लोकस्य | लोक (६.१) |
| समागतस्य | समागत (√समा-गम् + क्त, ६.१) |
| आत्माधिकारा | आत्मन्–अधिकार (२.३) |
| विविधाश् | विविध (२.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| वाचः | वाच् (२.३) |
| प्रहृष्टरूपस्य | प्रहृष्ट (√प्र-हृष् + क्त)–रूप (६.१) |
| पुरे | पुर (७.१) |
| जनस्य | जन (६.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | रा | घ | व | स्त | त्र | क | था | प्र | ला | पं |
| शु | श्रा | व | लो | क | स्य | स | मा | ग | त | स्य |
| आ | त्मा | धि | का | रा | वि | वि | धा | श्च | वा | चः |
| प्र | हृ | ष्ट | रू | प | स्य | पु | रे | ज | न | स्य |