अन्वयः
पितृहिते रतः devoted to the wellbeing of his father, रामः Rama, चिन्तयामास reflected, अद्यैव today only, नृपतिः the king, किं स्वित् why is it, माम् me, न प्रत्यभिनन्दति not reciprocating my greeting.
M N Dutt
And clever Rāma, intent on his father's welfare, thought within himself:, Why does not the king display joy on my arrival to-day.
Summary
Devoted to his father's wellbeing, Rama reflected, Why does not father reciprocate my greeting (like on other days)?
पदच्छेदः
| चिन्तयामास | चिन्तयामास (√चिन्तय् प्र.पु. एक.) |
| च | च (अव्ययः) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
| रामः | राम (१.१) |
| पितृहिते | पितृ–हित (७.१) |
| रतः | रत (√रम् + क्त, १.१) |
| किंस्विद् | क (२.१)–स्विद् (अव्ययः) |
| अद्यैव | अद्य (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| नृपतिर् | नृपति (१.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| मां | मद् (२.१) |
| प्रत्यभिनन्दति | प्रत्यभिनन्दति (√प्रत्यभि-नन्द् लट् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| चि | न्त | या | मा | स | च | त | दा |
| रा | मः | पि | तृ | हि | ते | र | तः |
| किं | स्वि | द | द्यै | व | नृ | प | ति |
| र्न | मां | प्र | त्य | भि | न | न्द | ति |