पदच्छेदः
| मातरं | मातृ (२.१) |
| राघवः | राघव (१.१) |
| किंचित् | कश्चित् (२.१) |
| प्रसार्याञ्जलिम् | प्रसार्य (√प्र-सारय् + ल्यप्)–अञ्जलि (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| स | तद् (१.१) |
| स्वभावविनीतश् | स्वभाव–विनीत (√वि-नी + क्त, १.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| गौरवाच् | गौरव (५.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| तदानतः | तदा (अव्ययः)–आनत (√आ-नम् + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मा | त | रं | रा | घ | वः | किं | चि |
| त्प्र | सा | र्या | ञ्ज | लि | म | ब्र | वीत् |
| स | स्व | भा | व | वि | नी | त | श्च |
| गौ | र | वा | च्च | त | दा | न | तः |