मयार्चिता देवगणाः शिवादयो; महर्षयो भूतमहासुरोरगाः ।
अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते; हितानि काङ्क्षन्तु दिशश्च राघव ॥
मयार्चिता देवगणाः शिवादयो; महर्षयो भूतमहासुरोरगाः ।
अभिप्रयातस्य वनं चिराय ते; हितानि काङ्क्षन्तु दिशश्च राघव ॥
अन्वयः
राघव O son of the Raghu race मया by me, अर्चिताः worshipped, शिवादयः Siva and others, देवगणाः gods, महर्षयः the great rishis, भूतमहासुरोरगाः bhutas, great asuras, serpents, दिशश्च four quarters, वनम् to the forest, अभिप्रयातस्य having exiled, ते your, हितानि welfare, चिराय for a long time, काङ्क्षन्तु may wish for.M N Dutt
Worshipped have I deities headed by Siva and others, the great ascetics, the Bhūtagaņas and the snakes; may they all and the four cardinal points, Oh Rāghava, contribute to your welfare, who are going to the forest for a long time.Summary
O son of the Raghu race Lord Siva and other gods, the great rishis, bhutas, great asuras and serpents and four quarters worshipped by me will always promote your welfare when you dwell in the forest.पदच्छेदः
| मयार्चिता | मद् (३.१)–अर्चित (√अर्चय् + क्त, १.३) |
| देवगणाः | देव–गण (१.३) |
| शिवादयो | शिव–आदि (१.३) |
| महर्षयो | महत्–ऋषि (१.३) |
| भूतमहासुरोरगाः | भूत–महत्–असुर–उरग (१.३) |
| अभिप्रयातस्य | अभिप्रयात (√अभिप्र-या + क्त, ६.१) |
| वनं | वन (२.१) |
| चिराय | चिराय (अव्ययः) |
| ते | त्वद् (४.१) |
| हितानि | हित (२.३) |
| काङ्क्षन्तु | काङ्क्षन्तु (√काङ्क्ष् लोट् प्र.पु. बहु.) |
| दिशश् | दिश् (१.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| राघव | राघव (८.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | या | र्चि | ता | दे | व | ग | णाः | शि | वा | द | यो |
| म | ह | र्ष | यो | भू | त | म | हा | सु | रो | र | गाः |
| अ | भि | प्र | या | त | स्य | व | नं | चि | रा | य | ते |
| हि | ता | नि | का | ङ्क्ष | न्तु | दि | श | श्च | रा | घ | व |
| ज | त | ज | र | ||||||||