इतीव चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना; समाप्य च स्वस्त्ययनं यथाविधि ।
प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं; पुनः पुनश्चापि निपीड्य सस्वजे ॥
इतीव चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना; समाप्य च स्वस्त्ययनं यथाविधि ।
प्रदक्षिणं चैव चकार राघवं; पुनः पुनश्चापि निपीड्य सस्वजे ॥
अन्वयः
इतीव speaking thus, सा she, अश्रुप्रतिपूर्णलोचना eyes filled with tears, यथाविधि duly, स्वस्त्ययनम् benedictory rites, समाप्य च having completed, राघवम् to the descendant of the Raghu dynasty, प्रदक्षिणं चकार circumambulate, पुनः पुनः च अपि repeatedly, निपीड्य holding him tight, सस्वजे embraced.M N Dutt
Kausalya, having her eyes full of tears, and performing the benedictory ceremonies with due rites, went round Rāghava with solemnity, and seeing him again and again sighed hot and hard.Summary
Thus with her eyes brimming with tears, she duly completed the benedictory rites and circumambulated the scion of the Raghus and embraced him again and again holding him tight.पदच्छेदः
| इतीव | इति (अव्ययः)–इव (अव्ययः) |
| चाश्रुप्रतिपूर्णलोचना | च (अव्ययः)–अश्रु–प्रतिपूर्ण (√प्रति-पृ + क्त)–लोचन (१.१) |
| समाप्य | समाप्य (√सम्-आप् + ल्यप्) |
| च | च (अव्ययः) |
| स्वस्त्ययनं | स्वस्त्ययन (२.१) |
| यथाविधि | यथाविधि (अव्ययः) |
| प्रदक्षिणं | प्रदक्षिण (२.१) |
| चैव | च (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| चकार | चकार (√कृ लिट् प्र.पु. एक.) |
| राघवं | राघव (२.१) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| पुनश् | पुनर् (अव्ययः) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| निपीड्य | निपीड्य (√नि-पीडय् + ल्यप्) |
| सस्वजे | सस्वजे (√स्वज् लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ती | व | चा | श्रु | प्र | ति | पू | र्ण | लो | च | ना |
| स | मा | प्य | च | स्व | स्त्य | य | नं | य | था | वि | धि |
| प्र | द | क्षि | णं | चै | व | च | का | र | रा | घ | वं |
| पु | नः | पु | न | श्चा | पि | नि | पी | ड्य | स | स्व | जे |
| ज | त | ज | र | ||||||||