वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्यं; त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम् ।
अभिप्रयास्यामि वनं समस्ता;नभ्यर्च्य शिष्टानपरान्द्विजातीन् ॥
वसिष्ठपुत्रं तु सुयज्ञमार्यं; त्वमानयाशु प्रवरं द्विजानाम् ।
अभिप्रयास्यामि वनं समस्ता;नभ्यर्च्य शिष्टानपरान्द्विजातीन् ॥
अन्वयः
त्वम् you, द्विजानाम् among the brahmins, प्रवरम् best, वशिष्ठपुत्रम् son of Vasistha, आर्यम् venerable, सुयज्ञम् Suyajna, आशु swiftly, आनय bring, शिष्टान् distinguished, अपरान् other, समस्तान् all, द्विजातीन् brahmins, अभ्यर्च्य having paid homage, वनम् to the forest, अभिप्रयास्यामि I shall go.Summary
Fetch Suyajna, son of Vasistha, best among the brahmins along with all other distinguished brahmins to whom I will pay my homage and leave for the forest.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकत्रिंशस्सर्गः॥Thus ends the thirtyfirst sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| वसिष्ठपुत्रं | वसिष्ठ–पुत्र (२.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| सुयज्ञम् | सुयज्ञ (२.१) |
| आर्यं | आर्य (२.१) |
| त्वम् | त्वद् (१.१) |
| आनयाशु | आनय (√आ-नी लोट् म.पु. )–आशु (अव्ययः) |
| प्रवरं | प्रवर (२.१) |
| द्विजानाम् | द्विज (६.३) |
| अभिप्रयास्यामि | अभिप्रयास्यामि (√अभिप्र-या लृट् उ.पु. ) |
| वनं | वन (२.१) |
| समस्तान् | समस्त (२.३) |
| अभ्यर्च्य | अभ्यर्च्य (√अभि-अर्चय् + ल्यप्) |
| शिष्टान् | शिष्ट (२.३) |
| अपरान् | अपर (२.३) |
| द्विजातीन् | द्विजाति (२.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | सि | ष्ठ | पु | त्रं | तु | सु | य | ज्ञ | मा | र्यं |
| त्व | मा | न | या | शु | प्र | व | रं | द्वि | जा | नाम् |
| अ | भि | प्र | या | स्या | मि | व | नं | स | म | स्ता |
| न | भ्य | र्च्य | शि | ष्टा | न | प | रा | न्द्वि | जा | तीन् |