पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सलो; वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चयः ।
स राघवः प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवी;न्निवेदयस्वागमनं नृपाय मे ॥
पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सलो; वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चयः ।
स राघवः प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवी;न्निवेदयस्वागमनं नृपाय मे ॥
अन्वयः
धर्मवत्सलः lover of righteousness, सः राघवः that son of the Raghus, पितुः father's, र्निदेशेन by command, वनप्रवेशे to enter forest, कृतबुद्धिनिश्चय: having made the decision, सुमन्त्रम् to Sumantra, प्रेक्ष्य having seen, अब्रवीत् said, नृपाय to king, मे my, आगमनम् arrival, निवेदयस्व informSummary
Rama, lover of righteousness, determined to go to the forest in obedience to his father's command said to Sumantra, Inform the king of my arrival.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रयस्त्रिंशस्सर्गः॥Thus ends the thirtythird sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| पितुर् | पितृ (६.१) |
| निदेशेन | निदेश (३.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| धर्मवत्सलो | धर्म–वत्सल (१.१) |
| वनप्रवेशे | वन–प्रवेश (७.१) |
| कृतबुद्धिनिश्चयः | कृत (√कृ + क्त)–बुद्धि–निश्चय (१.१) |
| स | तद् (१.१) |
| राघवः | राघव (१.१) |
| प्रेक्ष्य | प्रेक्ष्य (√प्र-ईक्ष् + ल्यप्) |
| सुमन्त्रम् | सुमन्त्र (२.१) |
| अब्रवीन् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| निवेदयस्वागमनं | निवेदयस्व (√नि-वेदय् लोट् म.पु. )–आगमन (२.१) |
| नृपाय | नृप (४.१) |
| मे | मद् (६.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पि | तु | र्नि | दे | शे | न | तु | ध | र्म | व | त्स | लो |
| व | न | प्र | वे | शे | कृ | त | बु | द्धि | नि | श्च | यः |
| स | रा | घ | वः | प्रे | क्ष्य | सु | म | न्त्र | म | ब्र | वी |
| न्नि | वे | द | य | स्वा | ग | म | नं | नृ | पा | य | मे |
| ज | त | ज | र | ||||||||