तं राममेवानुविचिन्तयन्तं; समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम् ।
उपोपविश्याधिकमार्तरूपा; विनिःश्वसन्ती विललाप कृच्छ्रम् ॥
तं राममेवानुविचिन्तयन्तं; समीक्ष्य देवी शयने नरेन्द्रम् ।
उपोपविश्याधिकमार्तरूपा; विनिःश्वसन्ती विललाप कृच्छ्रम् ॥
अन्वयः
देवी Kausalya, शयने in bed, रामम् एव Rama alone, अनुविचिन्तयन्तम् one who was continuously brooding, तं नरेन्द्रम् that king, समीक्ष्य having seen, उपोपविश्य sitting by his side, अधिकम् extremely, आर्तरूपा distressed, विनिश्वसन्ती sighing deeply, कृच्छ्रम् being in painful situation, विललाप lamented.M N Dutt
Then seeing that foremost of men absorbed in the contemplation of Rāma, that noble dame sat by him, and afflicted with greater grief, began to indulge in sorrow,* sighing heavily. *Another text reads vinisvasantam, joining it to narendram, foremost of men.Summary
Having seen the king in bed brooding over Rama, the queen, (Kausalya), sitting by his side, sighed and lamented, deeply anguished. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे द्विचत्वारिंशस्सर्गः॥Thus ends the fortysecond sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| तं | तद् (२.१) |
| रामम् | राम (२.१) |
| एवानुविचिन्तयन्तं | एव (अव्ययः)–अनुविचिन्तयत् (√अनुवि-चिन्तय् + शतृ, २.१) |
| समीक्ष्य | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्) |
| देवी | देवी (१.१) |
| शयने | शयन (७.१) |
| नरेन्द्रम् | नरेन्द्र (२.१) |
| उपोपविश्याधिकम् | उपोपविश्य (√उपोप-विश् + ल्यप्)–अधिक (२.१) |
| आर्तरूपा | आर्त–रूप (१.१) |
| विनिःश्वसन्ती | विनिःश्वसत् (√विनिः-श्वस् + शतृ, १.१) |
| विललाप | विललाप (√वि-लप् लिट् प्र.पु. एक.) |
| कृच्छ्रम् | कृच्छ्र (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | रा | म | मे | वा | नु | वि | चि | न्त | य | न्तं |
| स | मी | क्ष्य | दे | वी | श | य | ने | न | रे | न्द्रम् |
| उ | पो | प | वि | श्या | धि | क | मा | र्त | रू | पा |
| वि | निः | श्व | स | न्ती | वि | ल | ला | प | कृ | च्छ्रम् |