अन्वयः
श्रीमान् glorious, राघवः Rama, पितुः father's, भवनम् palace, प्रविशन्नेव while entering, कृताञ्जलिः folded hands, दूरात् from a distance, पितरम् to his father, प्रणिपत्य bending low in reverence, ददर्श beheld.
Summary
On entering his father's palace, glorious Rama, folded his hands and bent low in reverence from a distance and beheld his father.
पदच्छेदः
| प्रविशन्न् | प्रविशत् (√प्र-विश् + शतृ, १.१) |
| एव | एव (अव्ययः) |
| च | च (अव्ययः) |
| श्रीमान् | श्रीमत् (१.१) |
| राघवो | राघव (१.१) |
| भवनं | भवन (२.१) |
| पितुः | पितृ (६.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| पितरं | पितृ (२.१) |
| दूरात् | दूर (५.१) |
| प्रणिपत्य | प्रणिपत्य (√प्रणि-पत् + ल्यप्) |
| कृताञ्जलिः | कृत (√कृ + क्त)–अञ्जलि (१.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| प्र | वि | श | न्ने | व | च | श्री | मा |
| न्रा | घ | वो | भ | व | नं | पि | तुः |
| द | द | र्श | पि | त | रं | दू | रा |
| त्प्र | णि | प | त्य | कृ | ता | ञ्ज | लिः |