अन्वयः
रामः Rama, यम् शैलं वा any hill, काननं वापि or forest, अधिगमिष्यति approaches, they, प्राप्तं having arrived, प्रियातिथिम् इव like a welcome guest, एनम् him, अनर्चितुम् without extending hospitality, न शक्ष्यन्ति cannot.
M N Dutt
And forests and hills to which will repair Rāma cannot go without paying him homage like to a welcome guest.
Summary
Whichever hill or forest Rama visits, people will receive him there like a welcome guest and will not fail to render hospitality to him.
पदच्छेदः
| काननं | कानन (२.१) |
| वापि | वा (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| शैलं | शैल (२.१) |
| वा | वा (अव्ययः) |
| यं | यद् (२.१) |
| रामो | राम (१.१) |
| ऽभिगमिष्यति | अभिगमिष्यति (√अभि-गम् लृट् प्र.पु. एक.) |
| प्रियातिथिम् | प्रिय–अतिथि (२.१) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| प्राप्तं | प्राप्त (√प्र-आप् + क्त, २.१) |
| नैनं | न (अव्ययः)–एनद् (२.१) |
| शक्ष्यन्त्य् | शक्ष्यन्ति (√शक् लृट् प्र.पु. बहु.) |
| अनर्चितुम् | अनर्चितुम् (अव्ययः) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| का | न | नं | वा | पि | शै | लं | वा |
| यं | रा | मो | ऽभि | ग | मि | ष्य | ति |
| प्रि | या | ति | थि | मि | व | प्रा | प्तं |
| नै | नं | श | क्ष्य | न्त्य | न | र्चि | तुम् |