तथा शयानस्य ततोऽस्य धीमतो; यशस्विनो दाशरथेर्महात्मनः ।
अदृष्टदुःखस्य सुखोचितस्य सा; तदा व्यतीयाय चिरेण शर्वरी ॥
तथा शयानस्य ततोऽस्य धीमतो; यशस्विनो दाशरथेर्महात्मनः ।
अदृष्टदुःखस्य सुखोचितस्य सा; तदा व्यतीयाय चिरेण शर्वरी ॥
अन्वयः
ततः then, अदृष्टदुःखस्य one who never experienced troubles, सुखोचितस्य used to comforts, धीमतः sagacious, यशस्विनः illustrious, महात्मनः magnanimous, तदा then, तथा like that, शयानस्य lying down, अस्य दाशरथेः for this son of Dasaratha (Rama), सा that, शर्वरी night, चिरेण as of long duration, व्यतीयाय passed.M N Dutt
Thus the livelong night passed away with that illustrious, intelligent and high-souled son of Daśaratha, unacquainted with troubles and worthy of happiness.Summary
As the wise, illustrious, magnanimous son of Dasaratha (Rama) who was used to pleasures and not discomfort lay on the ground, the long night slipped away. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे पञ्चाशस्सर्गः॥Thus ends the fiftieth sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| तथा | तथा (अव्ययः) |
| शयानस्य | शयान (√शी + शानच्, ६.१) |
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| ऽस्य | इदम् (६.१) |
| धीमतो | धीमत् (६.१) |
| यशस्विनो | यशस्विन् (६.१) |
| दाशरथेर् | दाशरथि (६.१) |
| महात्मनः | महात्मन् (६.१) |
| अदृष्टदुःखस्य | अदृष्ट–दुःख (६.१) |
| सुखोचितस्य | सुख–उचित (६.१) |
| सा | तद् (१.१) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
| व्यतीयाय | व्यतीयाय (√व्यति-इ लिट् प्र.पु. एक.) |
| चिरेण | चिरेण (अव्ययः) |
| शर्वरी | शर्वरी (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | था | श | या | न | स्य | त | तो | ऽस्य | धी | म | तो |
| य | श | स्वि | नो | दा | श | र | थे | र्म | हा | त्म | नः |
| अ | दृ | ष्ट | दुः | ख | स्य | सु | खो | चि | त | स्य | सा |
| त | दा | व्य | ती | या | य | चि | रे | ण | श | र्व | री |
| ज | त | ज | र | ||||||||