गतं तु गङ्गापरपारमाशु; रामं सुमन्त्रः प्रततं निरीक्ष्य ।
अध्वप्रकर्षाद्विनिवृत्तदृष्टि;र्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी ॥
गतं तु गङ्गापरपारमाशु; रामं सुमन्त्रः प्रततं निरीक्ष्य ।
अध्वप्रकर्षाद्विनिवृत्तदृष्टि;र्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी ॥
अन्वयः
तपस्वी the miserable, सुमन्त्रः Sumantra, आशु swiftly, गङ्गापरपारम् other side of Ganga, गतम् reached, रामम् of Rama, प्रततम् continuously, निरीक्ष्य having gazed, अध्वप्रकर्षात् due to long distance, विनिवृत्तदृष्टिः turning away his sight, व्यथितः distressed, बाष्पम् मुमोच shed tears.M N Dutt
On Rāma having speedily crossed the Gangā, the distressed Sumantra who had been gazing at him steadfastly, being no longer able to discern him, turned away his eyes and, overcome with grief, shed tears.Summary
The wretched Sumantra kept gazing at Rama who swiftly reached the other side of the Ganga and only when he could not see him because of long distance, he turned away his gaze and, overcome with grief, shed tears.पदच्छेदः
| गतं | गत (√गम् + क्त, २.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| गङ्गापरपारम् | गङ्गा–अपर–पार (२.१) |
| आशु | आशु (अव्ययः) |
| रामं | राम (२.१) |
| सुमन्त्रः | सुमन्त्र (१.१) |
| प्रततं | प्रतत (√प्र-तन् + क्त, २.१) |
| निरीक्ष्य | निरीक्ष्य (√निः-ईक्ष् + ल्यप्) |
| अध्वप्रकर्षाद् | अध्वन्–प्रकर्ष (५.१) |
| विनिवृत्तदृष्टिर् | विनिवृत्त (√विनि-वृत् + क्त)–दृष्टि (१.१) |
| मुमोच | मुमोच (√मुच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| बाष्पं | बाष्प (२.१) |
| व्यथितस् | व्यथित (√व्यथ् + क्त, १.१) |
| तपस्वी | तपस्विन् (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | तं | तु | ग | ङ्गा | प | र | पा | र | मा | शु |
| रा | मं | सु | म | न्त्रः | प्र | त | तं | नि | री | क्ष्य |
| अ | ध्व | प्र | क | र्षा | द्वि | नि | वृ | त्त | दृ | ष्टि |
| र्मु | मो | च | बा | ष्पं | व्य | थि | त | स्त | प | स्वी |