तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं; महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम् ।
व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिवः; शशीव तारागणसंकुलं नभः ॥
तदग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं; महेन्द्रवेश्मप्रतिमं निवेशनम् ।
व्यदीपयंश्चारु विवेश पार्थिवः; शशीव तारागणसंकुलं नभः ॥
अन्वयः
पार्थिवः the king, अग्य्रवेषप्रमदाजनाकुलम् thronged with excellently attired women, महेन्द्रवेश्मप्रतिमम् equal to the palace of Mahendra, तं निवेशनम् that inner apartment, विदीपयन् illumining, चारु beautiful, तारागणसङ्कुलम् crowded with stars, नभः sky, शशीव like Moon, विवेश entered.Summary
The king entered the inner apartment thronged with excellently attired women which looked like the palace of Mahendra. He resembled the beautiful Moon that illuminates the sky crowded with stars.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे पञ्चमस्सर्गः॥Thus ends the fifth sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| तद् | तद् (१.१) |
| अग्र्यवेषप्रमदाजनाकुलं | अग्र्य–वेष–प्रमदा–जन–आकुल (२.१) |
| महेन्द्रवेश्मप्रतिमं | महत्–इन्द्र–वेश्मन्–प्रतिमा (२.१) |
| निवेशनम् | निवेशन (२.१) |
| विदीपयंश् | विदीपयत् (√वि-दीपय् + शतृ, १.१) |
| चारु | चारु (२.१) |
| विवेश | विवेश (√विश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| पार्थिवः | पार्थिव (१.१) |
| शशीव | शशिन् (१.१)–इव (अव्ययः) |
| तारागणसंकुलं | तारा–गण–संकुल (२.१) |
| नभः | नभस् (२.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | ग्र्य | वे | ष | प्र | म | दा | ज | ना | कु | लं |
| म | हे | न्द्र | वे | श्म | प्र | ति | मं | नि | वे | श | नम् |
| व्य | दी | प | यं | श्चा | रु | वि | वे | श | पा | र्थि | वः |
| श | शी | व | ता | रा | ग | ण | सं | कु | लं | न | भः |
| ज | त | ज | र | ||||||||