अनेकनानामृगपक्षिसंकुले; विचित्रपुष्पस्तबलैर्द्रुमैर्युते ।
वनोत्तमे व्यालमृगानुनादिते; तथा विजह्रुः सुसुखं जितेन्द्रियाः ॥
अनेकनानामृगपक्षिसंकुले; विचित्रपुष्पस्तबलैर्द्रुमैर्युते ।
वनोत्तमे व्यालमृगानुनादिते; तथा विजह्रुः सुसुखं जितेन्द्रियाः ॥
अन्वयः
तदा then, जितेन्द्रियाः who had conquered the senses, अनेकनानामृगपक्षिसङ्कुले filled with many varieties of animals and birds, विचित्रपुष्पस्तबकै: with bunches of bright flowers, द्रुमै with trees, युते full of, व्यालमृगानुनादिते echoing with the sounds of wild animals, वनोत्तमे in that splendid forest, सुसुखम् very happily, विजह्रु: wandered.पदच्छेदः
| अनेकनानामृगपक्षिसंकुले | अनेक–नाना (अव्ययः)–मृग–पक्षिन्–संकुल (७.१) |
| विचित्रपुष्पस्तबकैर् | विचित्र–पुष्प–स्तबक (३.३) |
| द्रुमैर् | द्रुम (३.३) |
| युते | युत (७.१) |
| वनोत्तमे | वन–उत्तम (७.१) |
| व्यालमृगानुनादिते | व्याल–मृग–अनुनादित (√अनु-नादय् + क्त, ७.१) |
| तथा | तथा (अव्ययः) |
| विजह्रुः | विजह्रुः (√वि-हृ लिट् प्र.पु. बहु.) |
| सुसुखं | सु (अव्ययः)–सुखम् (अव्ययः) |
| जितेन्द्रियाः | जित (√जि + क्त)–इन्द्रिय (१.३) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | क | ना | ना | मृ | ग | प | क्षि | सं | कु | ले |
| वि | चि | त्र | पु | ष्प | स्त | ब | लै | र्द्रु | मै | र्यु | ते |
| व | नो | त्त | मे | व्या | ल | मृ | गा | नु | ना | दि | ते |
| त | था | वि | ज | ह्रुः | सु | सु | खं | जि | ते | न्द्रि | याः |
| ज | त | ज | र | ||||||||