स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान् ।
ह्रादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम् ।
शतद्रूमतरच्छ्रीमान्नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः ॥
स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान् ।
ह्रादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम् ।
शतद्रूमतरच्छ्रीमान्नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः ॥
अन्वयः
द्युतिमान् the glorious, श्रीमान् the auspicious, इक्ष्वाकुकुलनन्दनः the delight of the Ikshvaku race, सः राघवः that (Bharata) of Raghu dynasty, राजगृहात् from Rajagriha, प्राङ्मुखः eastwards, अभिनिर्याय set out, ततः then, ताम् that, सुदामाम् Sudama, नदीम् river, आवेक्ष्य seen, सन्तीर्य having crossed, ह्लादिनीम् river Hladini, दूरपाराम् very wide, प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम् flowing westwards crested with waves, शतद्रूम् नदीम् river Satadru (Satlej), अतरत् crossed.M N Dutt
Issuing from the palace, the blazing Bharata endowed with prowess went in an easterly direction, and seeing before him the river called Sudāmā, crossed it. Then the auspicious descendant of Iksvāku crossed the broad Hrādinſ coursing westwards, as also the river Satadru.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| प्राङ्मुखो | प्राङ्मुख (१.१) |
| राजगृहाद् | राजगृह (५.१) |
| अभिनिर्याय | अभिनिर्याय (√अभिनिः-या + ल्यप्) |
| वीर्यवान् | वीर्यवत् (१.१) |
| ह्रादिनीं | ह्रादिनी (२.१) |
| दूरपारां | दूरपारा (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| प्रत्यक्स्रोतस्तरंगिणीम् | प्रत्यञ्च्–स्रोतस्–तरंगिणी (२.१) |
| शतद्रूम् | शतद्रू (२.१) |
| अतरच् | अतरत् (√तृ लङ् प्र.पु. एक.) |
| छ्रीमान् | श्रीमत् (१.१) |
| नदीम् | नदी (२.१) |
| इक्ष्वाकुनन्दनः | इक्ष्वाकु–नन्दन (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प्रा | ङ्मु | खो | रा | ज | गृ | हा | द | भि | नि | र्या |
| य | वी | र्य | वान् | ह्रा | दि | नीं | दू | र | पा | रां | च |
| प्र | त्य | क्स्रो | त | स्त | र | ङ्गि | णीम् | श | त | द्रू | म |
| त | र | च्छ्री | मा | न्न | दी | मि | क्ष्वा | कु | न | न्द | नः |