तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां; रजोरुणद्वारकपाटयन्त्राम् ।
दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरी प्रकाशां; दुःखेन संपूर्णतरो बभूव ॥
तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां; रजोरुणद्वारकपाटयन्त्राम् ।
दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरी प्रकाशां; दुःखेन संपूर्णतरो बभूव ॥
अन्वयः
शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्याम् a place with crossroads, houses, and highways deserted, रजोऽरुणद्वारकवाटयन्त्राम् the fittings (nuts and bolts) on the doors red with dust, इन्द्रपुरप्रकाशाम् once having the lustre of the city of Indra, तां पुरीम् that city, दृष्ट्वा having seen, दुःखेन with grief, सम्पूर्णतरः overwhelmed, बभूव became.M N Dutt
Beholding the city resembling the city of Indra, with her crossings and houses and roads void of people, and the doors and hinges covered with dust, Bharata was filled with greater grief.पदच्छेदः
| तां | तद् (२.१) |
| शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां | शून्य–शृङ्गाटक–वेश्मन्–रथ्या (२.१) |
| रजोऽरुणद्वारकपाटयन्त्राम् | रजस्–अरुण–द्वार–कपाट–यन्त्र (२.१) |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| पुरीम् | पुरी (२.१) |
| इन्द्रपुरीप्रकाशां | इन्द्र–पुरी–प्रकाश (२.१) |
| दुःखेन | दुःख (३.१) |
| सम्पूर्णतरो | सम्पूर्णतर (१.१) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तां | शू | न्य | शृ | ङ्गा | ट | क | वे | श्म | र | थ्यां |
| र | जो | रु | ण | द्वा | र | क | पा | ट | य | न्त्राम् |
| दृ | ष्ट्वा | पु | री | मि | न्द्र | पु | री | प्र | का | शां |
| दुः | खे | न | सं | पू | र्ण | त | रो | ब | भू | व |