अथ वा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा ।
सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्धिनीम् ।
निवर्तयिष्यामि वनाद्भ्रातरं स्वजनप्रियम् ॥
अथ वा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा ।
सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्धिनीम् ।
निवर्तयिष्यामि वनाद्भ्रातरं स्वजनप्रियम् ॥
अन्वयः
अथवा or, योगैः by employing the four expedients (conciliation, bribery, sowing dissenssions and punishment), बुद्धिबलेन वा or with the strength of intellect, मे to me, शक्तिः भवेत् I might get strength, अहम् I, पुत्रगर्धिनीम् covetous of son, त्वाम् you, सकामाम् having fulfilled your ambition, न करिष्यामि will not do.M N Dutt
And even if this strength be mine through yoga or vigour of intellect, I will not crown with success the hopes of you, proud of your son.Summary
If I gather the strength (to carry the burden) either by employing the four expedients (available to a king against an enemy) or by the power of intellect, I will not allow you, covetous of your son, to fulfil your ambition.पदच्छेदः
| अथवा | अथवा (अव्ययः) |
| मे | मद् (६.१) |
| भवेच् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| छक्तिर् | शक्ति (१.१) |
| योगैर् | योग (३.३) |
| बुद्धिबलेन | बुद्धि–बल (३.१) |
| वा | वा (अव्ययः) |
| सकामां | स (अव्ययः)–काम (२.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| करिष्यामि | करिष्यामि (√कृ लृट् उ.पु. ) |
| त्वाम् | त्वद् (२.१) |
| अहं | मद् (१.१) |
| पुत्रगर्धिनीम् | पुत्र–गर्धिन् (२.१) |
| निवर्तयिष्यामि | निवर्तयिष्यामि (√नि-वर्तय् लृट् उ.पु. ) |
| वनाद् | वन (५.१) |
| भ्रातरं | भ्रातृ (२.१) |
| स्वजनप्रियम् | स्व–जन–प्रिय (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | वा | मे | भ | वे | च्छ | क्ति | र्यो | गै | र्बु | द्धि |
| ब | ले | न | वा | स | का | मां | न | क | रि | ष्या | मि |
| त्वा | म | हं | पु | त्र | ग | र्धि | नीम् | नि | व | र्त | यि |
| ष्या | मि | व | ना | द्भ्रा | त | रं | स्व | ज | न | प्रि | यम् |