इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा; प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम् ।
शोकातुरश्चापि ननाद भूयः; सिंहो यथा पर्वतगह्वरस्थः ॥
इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा; प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम् ।
शोकातुरश्चापि ननाद भूयः; सिंहो यथा पर्वतगह्वरस्थः ॥
अन्वयः
महात्मा highsouled, भरतः Bharata, इत्येवम् in this manner, उक्त्वा having spoken, प्रियेतरैः unpleasant, वाक्यगणैः with words, ताम् her, तुदन् afflicting, शोकातुरः overwhelmed with grief, पर्वतगह्वरस्थः inside a mountaincave, सिंहो यथा like a lion, भूयश्चापि once again, ननाद cried out loudly.M N Dutt
The high-souled Bharata afflicted (his mother) with multitudes of words causing pain; and distressed with grief, emitted sounds like to a lion in the cave of Mandāra.Summary
Having inflicted on his mother these unpleasant words in this manner, the highsouled Bharata, overwhelmed with grief, roared again like a lion in a mountaincave.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रिसप्ततितमस्सर्गः॥Thus ends the seventythird sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| इत्य् | इति (अव्ययः) |
| एवम् | एवम् (अव्ययः) |
| उक्त्वा | उक्त्वा (√वच् + क्त्वा) |
| भरतो | भरत (१.१) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
| प्रियेतरैर् | प्रिय–इतर (३.३) |
| वाक्यगणैस् | वाक्य–गण (३.३) |
| तुदंस् | तुदत् (√तुद् + शतृ, १.१) |
| ताम् | तद् (२.१) |
| शोकातुरश् | शोक–आतुर (१.१) |
| चापि | च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| ननाद | ननाद (√नद् लिट् प्र.पु. एक.) |
| भूयः | भूयस् (अव्ययः) |
| सिंहो | सिंह (१.१) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| पर्वतगह्वरस्थः | पर्वत–गह्वर–स्थ (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्ये | व | मु | क्त्वा | भ | र | तो | म | हा | त्मा |
| प्रि | ये | त | रै | र्वा | क्य | ग | णै | स्तु | दं | स्ताम् |
| शो | का | तु | र | श्चा | पि | न | ना | द | भू | यः |
| सिं | हो | य | था | प | र्व | त | ग | ह्व | र | स्थः |