अन्वयः
सर्ववेदज्ञः wellversed in all the Vedas, सः Vasistha, सुखास्तरणसंवृतम् covered with comfortable spread, काञ्चनमयम् made of gold, पीठम् seat, अध्यास्त sat, दूतान् messengers, अनुशशास च ordered too.
Summary
Vasistha, wellversed in all the Vedas, sat on a golden seat with a comfortable cover and ordered the messengers:
पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| काञ्चनमयं | काञ्चन–मय (२.१) |
| पीठं | पीठ (२.१) |
| परार्ध्यास्तरणावृतम् | परार्ध्य–आस्तरण–आवृत (√आ-वृ + क्त, २.१) |
| अध्यास्त | अध्यास्त (√अधि-आस् लङ् प्र.पु. एक.) |
| सर्ववेदज्ञो | सर्व–वेद–ज्ञ (१.१) |
| दूतान् | दूत (२.३) |
| अनुशशास | अनुशशास (√अनु-शास् लिट् प्र.पु. एक.) |
| च | च (अव्ययः) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| स | का | ञ्च | न | म | यं | पी | ठं |
| प | रा | र्ध्या | स्त | र | णा | वृ | तम् |
| अ | ध्या | स्त | स | र्व | वे | द | ज्ञो |
| दू | ता | न | नु | श | शा | स | च |