तूर्णं समुत्थाय सुमन्त्र गच्छ; बलस्य योगाय बलप्रधानान् ।
आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं; प्रसाद्य रामं जगतो हिताय ॥
तूर्णं समुत्थाय सुमन्त्र गच्छ; बलस्य योगाय बलप्रधानान् ।
आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं; प्रसाद्य रामं जगतो हिताय ॥
अन्वयः
सुमन्त्र Sumantra, समुत्थाय arise, बलस्य the army's, योगाय to assemble, बलप्रधानान् to leaders of the army, तूर्णम् quickly, गच्छ go, वनस्थम् who is in the forest, तम् रामम् that Rama, प्रसाद्य having appeased, जगतः world's, हिताय welfare, आनेतुम् to bring, इच्छामि हि am wishing.M N Dutt
O Sumantra, arise you speedily and, your desire fully attained, go by my command, and tell the chiefs of the army, and our principal adherents to array the forces.Summary
O Sumantra, arise, go at once to the leaders of the army and ask them to assemble the troops. I shall propifiate Rama who is in the deep forest and bring him back for the welfare of the world.पदच्छेदः
| तूर्णं | तूर्णम् (अव्ययः) |
| समुत्थाय | समुत्थाय (√समुत्-स्था + ल्यप्) |
| सुमन्त्र | सुमन्त्र (८.१) |
| गच्छ | गच्छ (√गम् लोट् म.पु. ) |
| बलस्य | बल (६.१) |
| योगाय | योग (४.१) |
| बलप्रधानान् | बल–प्रधान (२.३) |
| आनेतुम् | आनेतुम् (√आ-नी + तुमुन्) |
| इच्छामि | इच्छामि (√इष् लट् उ.पु. ) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| तं | तद् (२.१) |
| वनस्थं | वन–स्थ (२.१) |
| प्रसाद्य | प्रसाद्य (√प्र-सादय् + ल्यप्) |
| रामं | राम (२.१) |
| जगतो | जगन्त् (६.१) |
| हिताय | हित (४.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तू | र्णं | स | मु | त्था | य | सु | म | न्त्र | ग | च्छ |
| ब | ल | स्य | यो | गा | य | ब | ल | प्र | धा | नान् |
| आ | ने | तु | मि | च्छा | मि | हि | तं | व | न | स्थं |
| प्र | सा | द्य | रा | मं | ज | ग | तो | हि | ता | य |