ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम् ।
निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन्संत्वरितोऽब्रवीत् ॥
ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम् ।
निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन्संत्वरितोऽब्रवीत् ॥
अन्वयः
ततः then, निषादराजः king of the nishadas (Guha), गङ्गां नदीम् river Ganga, अन्वाश्रिताम् all along the bank, निविष्टाम् encamped, ध्वजिनीम् the bannered army, दृष्ट्वैव on seeing, सन्त्वरितः hurriedly, ज्ञातीन् to relatives, अब्रवीत् said.M N Dutt
Seeing the forces with banners flying quartered on the banks of the river Gangā, and engaged in carious occupations, the lord of the Nisadas, Guha, said to his relatives ranged around.Summary
Guha, king of the nishadas, observed the bannered army encamped all along the bank of the river Ganga, hurried off and said to his kinsmen:पदच्छेदः
| ततो | ततस् (अव्ययः) |
| निविष्टां | निविष्ट (√नि-विश् + क्त, २.१) |
| ध्वजिनीं | ध्वजिनी (२.१) |
| गङ्गाम् | गङ्गा (२.१) |
| अन्वाश्रितां | अन्वाश्रित (√अन्वा-श्रि + क्त, २.१) |
| नदीम् | नदी (२.१) |
| निषादराजो | निषाद–राज (१.१) |
| दृष्ट्वैव | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा)–एव (अव्ययः) |
| ज्ञातीन् | ज्ञाति (२.३) |
| संत्वरितो | संत्वरित (√सम्-त्वर् + क्त, १.१) |
| ऽब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | नि | वि | ष्टां | ध्व | जि | नीं |
| ग | ङ्गा | म | न्वा | श्रि | तां | न | दीम् |
| नि | षा | द | रा | जो | दृ | ष्ट्वै | व |
| ज्ञा | ती | न्सं | त्व | रि | तो | ऽब्र | वीत् |