यदा हि रामः पृथिवीमवाप्स्यति; ध्रुवं प्रनष्टो भरतो भविष्यति ।
अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे; परस्य चाद्यैव विवासकारणम् ॥
यदा हि रामः पृथिवीमवाप्स्यति; ध्रुवं प्रनष्टो भरतो भविष्यति ।
अतो हि संचिन्तय राज्यमात्मजे; परस्य चाद्यैव विवासकारणम् ॥
अन्वयः
राम: Rama, यदा हि when, पृथिवीम् this earth, अवाप्स्यति obtains, भरत: Bharata, ध्रृवम् certainly, प्रणष्ट: ruined, भविष्यति will become, अत: for that reason, आत्मजे your son, राज्यम् kingdom, अद्यैव right now, परस्य enemy Rama's, विवासकारणम् means of banishment, सञ्चिन्तय think over.Summary
When Rama obtains this earth, Bharata will be certainly ruined. Therefore, right now think of the kingdom for your son and the means of banishment for your enemy, Rama. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे अष्टमस्सर्गः॥Thus ends the eighth sarga of Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| यदा | यदा (अव्ययः) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| रामः | राम (१.१) |
| पृथिवीम् | पृथिवी (२.१) |
| अवाप्स्यति | अवाप्स्यति (√अव-आप् लृट् प्र.पु. एक.) |
| ध्रुवं | ध्रुवम् (अव्ययः) |
| प्रनष्टो | प्रनष्ट (√प्र-नश् + क्त, १.१) |
| भरतो | भरत (१.१) |
| भविष्यति | भविष्यति (√भू लृट् प्र.पु. एक.) |
| अतो | अतस् (अव्ययः) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| संचिन्तय | संचिन्तय (√सम्-चिन्तय् लोट् म.पु. ) |
| राज्यम् | राज्य (२.१) |
| आत्मजे | आत्मज (७.१) |
| परस्य | पर (६.१) |
| चाद्यैव | च (अव्ययः)–अद्य (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| विवासकारणम् | विवास–कारण (२.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | हि | रा | मः | पृ | थि | वी | म | वा | प्स्य | ति |
| ध्रु | वं | प्र | न | ष्टो | भ | र | तो | भ | वि | ष्य | ति |
| अ | तो | हि | सं | चि | न्त | य | रा | ज्य | मा | त्म | जे |
| प | र | स्य | चा | द्यै | व | वि | वा | स | का | र | णम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||