इतीव रामो बहुसंगतं वचः; प्रिया सहायः सरितं प्रति ब्रुवन् ।
चचार रम्यं नयनाञ्जनप्रभं; स चित्रकूटं रघुवंशवर्धनः ॥
इतीव रामो बहुसंगतं वचः; प्रिया सहायः सरितं प्रति ब्रुवन् ।
चचार रम्यं नयनाञ्जनप्रभं; स चित्रकूटं रघुवंशवर्धनः ॥
अन्वयः
रघुवंशवर्धनः perpetuator of Raghu dynasty, सः रामः that Rama, इतीव in this manner, सरितं प्रति about Mandakini river, बहु at length, सङ्गतम् appropriate, वचः words, ब्रुवन् speaking, प्रियासहायः in the company of his beloved, नयनाञ्जनप्रभम् resembling collyrium in hue, रम्यम् delightful, चित्रकूटम् Chitrakuta, चचार wandered about.M N Dutt
Having thus along with his beloved one, spoken variously regarding the stream, that perpetuator of the Raghu race, began to range the charming Citrakuța, resembling the collyrium in hue.Summary
Rama, the perpetuator of the Raghu dynasty, describing the river Mandakini at length appropriately in this manner, wandered in the company of his beloved consort on mount Chitrakuta looking black like collyrium.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे पञ्चनवतितमस्सर्गः॥Thus ends the ninetyfifth sarga in Ayodhyakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| इतीव | इति (अव्ययः)–इव (अव्ययः) |
| रामो | राम (१.१) |
| बहुसंगतं | बहु–संगत (√सम्-गम् + क्त, २.१) |
| वचः | वचस् (२.१) |
| प्रियासहायः | प्रिया–सहाय (१.१) |
| सरितं | सरित् (२.१) |
| प्रति | प्रति (अव्ययः) |
| ब्रुवन् | ब्रुवत् (√ब्रू + शतृ, १.१) |
| चचार | चचार (√चर् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रम्यं | रम्य (२.१) |
| नयनाञ्जनप्रभं | नयन–अञ्जन–प्रभा (२.१) |
| स | तद् (१.१) |
| चित्रकूटं | चित्रकूट (२.१) |
| रघुवंशवर्धनः | रघु–वंश–वर्धन (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ती | व | रा | मो | ब | हु | सं | ग | तं | व | चः |
| प्रि | या | स | हा | यः | स | रि | तं | प्र | ति | ब्रु | वन् |
| च | चा | र | र | म्यं | न | य | ना | ञ्ज | न | प्र | भं |
| स | चि | त्र | कू | टं | र | घु | वं | श | व | र्ध | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||