अन्वयः
त्वम् you, सदा always, भर्तु: for your husband, दयिता a beloved one, अत्र in this matter, मे to me, संशय: doubt, नास्ति not there, त्वत्कृते for your sake, स: महाराज: that great king, हुताशनम् in the burning fire, विशेदपि will enter.
Summary
No doubt, you have always been a beloved wife to your husband. For your sake the great king will even enter into the burning fire.
पदच्छेदः
| दयिता | दयित (१.१) |
| त्वं | त्वद् (१.१) |
| सदा | सदा (अव्ययः) |
| भर्तुर् | भर्तृ (६.१) |
| अत्र | अत्र (अव्ययः) |
| मे | मद् (६.१) |
| नास्ति | न (अव्ययः)–अस्ति (√अस् लट् प्र.पु. एक.) |
| संशयः | संशय (१.१) |
| त्वत्कृते | त्वद्–कृत (७.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| महाराजो | महत्–राज (१.१) |
| विशेद् | विशेत् (√विश् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| हुताशनम् | हुताशन (२.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| द | यि | ता | त्वं | स | दा | भ | र्तु |
| र | त्र | मे | ना | स्ति | सं | श | यः |
| त्व | त्कृ | ते | च | म | हा | रा | जो |
| वि | शे | द | पि | हु | ता | श | नम् |