अन्वयः
मनुजाधिप O lord of men, यः who त्वं यथा like you, परावरज्ञः knower of past and future, सः that person, एव this, व्यसनम् distress, प्राप्य having obtained, विषीदितुं to lament, न अर्हति is not proper.
Summary
O lord of men, it is not proper for a person like you who knows the past and the future of human beings to feel distressed and lament over it.
पदच्छेदः
| यस्यैष | यद् (६.१)–एतद् (१.१) |
| बुद्धिलाभः | बुद्धि–लाभ (१.१) |
| स्यात् | स्यात् (√अस् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| परितप्येत | परितप्येत (√परि-तप् प्र.पु. एक.) |
| केन | क (३.१) |
| सः | तद् (१.१) |
| स | तद् (१.१) |
| एवं | एवम् (अव्ययः) |
| व्यसनं | व्यसन (२.१) |
| प्राप्य | प्राप्य (√प्र-आप् + ल्यप्) |
| न | न (अव्ययः) |
| विषीदितुम् | विषीदितुम् (√वि-सद् + तुमुन्) |
| अर्हति | अर्हति (√अर्ह् लट् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| य | स्यै | ष | बु | द्धि | ला | भः | स्या |
| त्प | रि | त | प्ये | त | के | न | सः |
| स | ए | वं | व्य | स | नं | प्रा | प्य |
| न | वि | षी | दि | तु | म | र्ह | ति |