अन्वयः
भवान् you, तत् अपत्यम् अस्तु be such a son, लोके in this world, धीरविगर्हितम् condemned by men of wisdom, दुष्कृतम् sinful, पितुः father's, कृतम् committed, कर्म act, भवान् you, अभिपत्ता an approver, मास्तु let not become.
Summary
So be a worthy son and let not the sinful act committed by our father and condemned by men of wisdom be approved by you.
पदच्छेदः
| तद् | तद् (१.१) |
| अपत्यं | अपत्य (१.१) |
| भवान् | भवत् (१.१) |
| अस्तु | अस्तु (√अस् लोट् प्र.पु. एक.) |
| मा | मा (अव्ययः) |
| भवान् | भवत् (१.१) |
| दुष्कृतं | दुष्कृत (१.१) |
| पितुः | पितृ (६.१) |
| अभिपत्ता | अभिपत्ता (√अभि-पत् लुट् प्र.पु. एक.) |
| कृतं | कृत (√कृ + क्त, १.१) |
| कर्म | कर्मन् (१.१) |
| लोके | लोक (७.१) |
| धीरविगर्हितम् | धीर–विगर्हित (√वि-गर्ह् + क्त, १.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| त | द | प | त्यं | भ | वा | न | स्तु |
| मा | भ | वा | न्दु | ष्कृ | तं | पि | तुः |
| अ | भि | प | त्त | त्कृ | तं | क | र्म |
| लो | के | धी | र | वि | ग | र्हि | तम् |