अन्वयः
भरत O Bharata, मत्कृते for my sake, प्रभुम् competent, राजानम् king, ऋणात् from his debt (vow), मोचय redeem, धर्मज्ञम् one who knows righteousness, पितरम् चापि father also, मातरं च and mother, अभिनन्दय honour.
Summary
O Bharata, release for my sake the competent king from his debt (of vow) and honour the righteous father and the mother as well.
पदच्छेदः
| ऋणान् | ऋण (५.१) |
| मोचय | मोचय (√मोचय् लोट् म.पु. ) |
| राजानं | राजन् (२.१) |
| मत्कृते | मद्–कृते (अव्ययः) |
| भरत | भरत (८.१) |
| प्रभुम् | प्रभु (२.१) |
| पितरं | पितृ (२.१) |
| त्राहि | त्राहि (√त्रा लोट् म.पु. ) |
| धर्मज्ञ | धर्म–ज्ञ (८.१) |
| मातरं | मातृ (२.१) |
| चाभिनन्दय | च (अव्ययः)–अभिनन्दय (√अभि-नन्दय् लोट् म.पु. ) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ऋ | णा | न्मो | च | य | रा | जा | नं |
| म | त्कृ | ते | भ | र | त | प्र | भुम् |
| पि | त | रं | त्रा | हि | ध | र्म | ज्ञ |
| मा | त | रं | चा | भि | न | न्द | य |