जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो; मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत् ।
पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवा;ञ्जटायुषा संकथितं पुनः पुनः ॥
जटायुषं तु प्रतिपूज्य राघवो; मुदा परिष्वज्य च संनतोऽभवत् ।
पितुर्हि शुश्राव सखित्वमात्मवा;ञ्जटायुषा संकथितं पुनः पुनः ॥
अन्वयः
राघवः Rama, तं जटायुषम् to that Jatayu, प्रतिपूज्य having worshipped, मुदा with joy, परिष्वज्य च having embraced, सन्नतः bent down, अभवत् he became, आत्मवान् selfpossessed Rama, जटायुषा with Jatayu, पुनः पुनः again and again, सङ्कथितम् narrated, पितुः father's, सखित्वम् friendship, शुश्राव heard.M N Dutt
There Rāghava paying homage to Jațāyu, and embracing him jcyfully, bent low; and that selfpossessed one listened to the story of Jațāyu's friendship with his father, as related by him repeatedly.Summary
Rama worshipped Jatayu and bending down, embraced him. He heard from him again and again several events relating to Jatayu's friendship with his father.पदच्छेदः
| जटायुषं | जटायुष (२.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| प्रतिपूज्य | प्रतिपूज्य (√प्रति-पूजय् + ल्यप्) |
| राघवो | राघव (१.१) |
| मुदा | मुद् (३.१) |
| परिष्वज्य | परिष्वज्य (√परि-स्वज् + ल्यप्) |
| च | च (अव्ययः) |
| संनतो | संनत (√सम्-नम् + क्त, १.१) |
| ऽभवत् | अभवत् (√भू लङ् प्र.पु. एक.) |
| पितुर् | पितृ (६.१) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| शुश्राव | शुश्राव (√श्रु लिट् प्र.पु. एक.) |
| सखित्वम् | सखित्व (२.१) |
| आत्मवाञ् | आत्मवत् (१.१) |
| जटायुषा | जटायुस् (३.१) |
| संकथितं | संकथित (√सम्-कथय् + क्त, १.१) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | टा | यु | षं | तु | प्र | ति | पू | ज्य | रा | घ | वो |
| मु | दा | प | रि | ष्व | ज्य | च | सं | न | तो | ऽभ | वत् |
| पि | तु | र्हि | शु | श्रा | व | स | खि | त्व | मा | त्म | वा |
| ञ्ज | टा | यु | षा | सं | क | थि | तं | पु | नः | पु | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||