पदच्छेदः
| पर्णशालां | पर्ण–शाला (२.१) |
| सुविपुलां | सु (अव्ययः)–विपुल (२.१) |
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| संघातमृत्तिकाम् | संघात–मृत्तिका (२.१) |
| सुस्तम्भां | सु (अव्ययः)–स्तम्भ (२.१) |
| मस्करैर् | मस्कर (३.३) |
| दीर्घैः | दीर्घ (३.३) |
| कृतवंशां | कृत (√कृ + क्त)–वंश (२.१) |
| सुशोभनाम् | सु (अव्ययः)–शोभन (२.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | र्ण | शा | लां | सु | वि | पु | लां |
| त | त्र | सं | घा | त | मृ | त्ति | काम् |
| सु | स्त | म्भां | म | स्क | रै | र्दी | र्घैः |
| कृ | त | वं | शां | सु | शो | भ | नाम् |