इति स्वदोषान्परिकीर्तितांस्तया; समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वरः ।
धनेन दर्पेण बलेन चान्वितो; विचिन्तयामास चिरं स रावणः ॥
इति स्वदोषान्परिकीर्तितांस्तया; समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वरः ।
धनेन दर्पेण बलेन चान्वितो; विचिन्तयामास चिरं स रावणः ॥
अन्वयः
क्षणदाचरेश्वरः lord of nightwalkers, धनेन by wealth, दर्पेण by arrogance, बलेन च and by strength, अन्वितः heeding, सः रावणः that Ravana, इति thus, तया by her, परिकीर्तितान् mentioned, स्वदोषान् his mistakes, बुद्ध्या by his intellect, समीक्ष्य after reviewing, चिरम् for a long time, विचिन्तयामास started thinking over.M N Dutt
On his vices having been thus celebrated by her (Surpanakhā), that lord of the rangers of night, Råvaņa, musing awhile, was long plunged in thought.Summary
Ravana, king of demons, wealthy, arrogant and mighty, listened to Surpanakha and pondered over the mistakes she mentioned.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे त्रयस्त्रिंशस्सर्गः॥Thus ends the thirtythird sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| इति | इति (अव्ययः) |
| स्वदोषान् | स्व–दोष (२.३) |
| परिकीर्तितांस् | परिकीर्तित (√परि-कीर्तय् + क्त, २.३) |
| तया | तद् (३.१) |
| समीक्ष्य | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्) |
| बुद्ध्या | बुद्धि (३.१) |
| क्षणदाचरेश्वरः | क्षणदा–चर–ईश्वर (१.१) |
| धनेन | धन (३.१) |
| दर्पेण | दर्प (३.१) |
| बलेन | बल (३.१) |
| चान्वितो | च (अव्ययः)–अन्वित (१.१) |
| विचिन्तयामास | विचिन्तयामास (√वि-चिन्तय् प्र.पु. एक.) |
| चिरं | चिरम् (अव्ययः) |
| स | तद् (१.१) |
| रावणः | रावण (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | स्व | दो | षा | न्प | रि | की | र्ति | तां | स्त | या |
| स | मी | क्ष्य | बु | द्ध्या | क्ष | ण | दा | च | रे | श्व | रः |
| ध | ने | न | द | र्पे | ण | ब | ले | न | चा | न्वि | तो |
| वि | चि | न्त | या | मा | स | चि | रं | स | रा | व | णः |
| ज | त | ज | र | ||||||||