रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतनः ।
पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि ।
प्राप्य संज्ञां चिरात्तात लङ्कां प्रति गतः पुरीम् ॥
रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतनः ।
पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि ।
प्राप्य संज्ञां चिरात्तात लङ्कां प्रति गतः पुरीम् ॥
अन्वयः
तात O dear, तदा then, अहम् I, गम्भीरे in deep, सागराम्भसि in sea water, पातितः was thrown, चिरात् after a long time, संज्ञाम् consciousess, प्राप्य after attaining, लङ्कां पुरीम् city of Lanka, प्रतिगतः went towards.M N Dutt
He had no mind of killing me then and for this he saved my life. I was thrown however into the deep ocean being hindered by the velocity of his arrows and having lost my consciousness. Regaining my sense after a long while I returned to the city of Lankā.Summary
O dear I was thrown into the deep sea and after a long time regained consciousness and returned to the city of Lanka.पदच्छेदः
| रामस्य | राम (६.१) |
| शरवेगेन | शर–वेग (३.१) |
| निरस्तो | निरस्त (√निः-अस् + क्त, १.१) |
| भ्रान्तचेतनः | भ्रान्त (√भ्रम् + क्त)–चेतना (१.१) |
| पातितो | पातित (√पातय् + क्त, १.१) |
| ऽहं | मद् (१.१) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
| तेन | तद् (३.१) |
| गम्भीरे | गम्भीर (७.१) |
| सागराम्भसि | सागर–अम्भस् (७.१) |
| प्राप्य | प्राप्य (√प्र-आप् + ल्यप्) |
| संज्ञां | संज्ञा (२.१) |
| चिरात् | चिरात् (अव्ययः) |
| तात | तात (८.१) |
| लङ्कां | लङ्का (२.१) |
| प्रति | प्रति (अव्ययः) |
| गतः | गत (√गम् + क्त, १.१) |
| पुरीम् | पुरी (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | म | स्य | श | र | वे | गे | न | नि | र | स्तो | भ्रा |
| न्त | चे | त | नः | पा | ति | तो | ऽहं | त | दा | ते | न |
| ग | म्भी | रे | सा | ग | रा | म्भ | सि | प्रा | प्य | सं | ज्ञां |
| चि | रा | त्ता | त | ल | ङ्कां | प्र | ति | ग | तः | पु | रीम् |