दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
ये हयाः पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य नः श्रुताः ।
अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम् ॥
दृष्ट्वा शतक्रतुं तत्र रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
ये हयाः पुरुहूतस्य पुरा शक्रस्य नः श्रुताः ।
अन्तरिक्षगता दिव्यास्त इमे हरयो ध्रुवम् ॥
अन्वयः
पुरुहूतस्य of Indra who is often invoked, शक्रस्य of Indra, ये those, हयाः horses, नः for us, पुरा earlier, श्रुताः heard, ते those, हरयः horses, अन्तरिक्षगताः stationed in the sky, दिव्याः wonderful, इमे we, ध्रुवम् surely.M N Dutt
The steeds standing in the sky are for certain those of which we had formerly heard as beionging to Sakra of many sacrifices.Summary
The horses of Indra, who is often invoked (during sacrificial rituals) and about whom we have heard earlier, are now stationed in the sky.पदच्छेदः
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा) |
| शतक्रतुं | शतक्रतु (२.१) |
| तत्र | तत्र (अव्ययः) |
| रामो | राम (१.१) |
| लक्ष्मणम् | लक्ष्मण (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
| ये | यद् (१.३) |
| हयाः | हय (१.३) |
| पुरुहूतस्य | पुरुहूत (६.१) |
| पुरा | पुरा (अव्ययः) |
| शक्रस्य | शक्र (६.१) |
| नः | मद् (६.३) |
| श्रुताः | श्रुत (√श्रु + क्त, १.३) |
| अन्तरिक्षगता | अन्तरिक्ष–गत (√गम् + क्त, १.३) |
| दिव्यास् | दिव्य (१.३) |
| त | तद् (१.३) |
| इमे | इदम् (१.३) |
| हरयो | हरि (१.३) |
| ध्रुवम् | ध्रुवम् (अव्ययः) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृ | ष्ट्वा | श | त | क्र | तुं | त | त्र | रा | मो | ल | क्ष्म |
| ण | म | ब्र | वीत् | ये | ह | याः | पु | रु | हू | त | स्य |
| पु | रा | श | क्र | स्य | नः | श्रु | ताः | अ | न्त | रि | क्ष |
| ग | ता | दि | व्या | स्त | इ | मे | ह | र | यो | ध्रु | वम् |