तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा ।
तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा ।
बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम् ॥
तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा ।
तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा ।
बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम् ॥
अन्वयः
काञ्चनवर्णेन by its golden colour, मणिप्रवरशृङ्गिणा horned with excellent gems, तरुणादित्यवर्णेन by its colour resembling the rising Sun, नक्षत्रपथवर्चसा by shining like the milkyway, तेन by, राघवस्य of Rama, मनः अपि mind also, विस्मयम् amazement, आगतम् arose.Summary
By his golden colour resembling the rising Sun, by his horns with excellent gems shining like the milkyway, even Rama's mind was wonderstruck.पदच्छेदः
| तेन | तद् (३.१) |
| काञ्चनरोम्ना | काञ्चनरोमन् (३.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| मणिप्रवरशृङ्गिणा | मणि–प्रवर–शृङ्गिन् (३.१) |
| तरुणादित्यवर्णेन | तरुण–आदित्य–वर्ण (३.१) |
| नक्षत्रपथवर्चसा | नक्षत्रपथ–वर्चस् (३.१) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
| राघवस्यापि | राघव (६.१)–अपि (अव्ययः) |
| मनो | मनस् (१.१) |
| विस्मयम् | विस्मय (२.१) |
| आगतम् | आगत (√आ-गम् + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | न | का | ञ्च | न | रो | म्णा | तु | म | णि | प्र | व |
| र | शृ | ङ्गि | णा | त | रु | णा | दि | त्य | व | र्णे | न |
| न | क्ष | त्र | प | थ | व | र्च | सा | ब | भू | व | रा |
| घ | व | स्या | पि | म | नो | वि | स्म | य | मा | ग | तम् |