अन्वयः
मैथिलि O Maithili, सञ्जातरोषस्य when I get angry, मम my, मुखम् face, दृष्ट्वैव on seeing alone, परित्रस्ताः frightened , शक्रपुरोगमाः led by Indra, सुराः gods, विद्रवन्ति run away.
M N Dutt
O Maithilee, when I am excited with ire, Indra and other celestials at the mere sight of my countenance fly away in divers directions out of fear.
Summary
O Princess from Mithila, seeing my angry face even gods led by Indra take to their heels in fear.
पदच्छेदः
| मम | मद् (६.१) |
| संजातरोषस्य | संजात (√सम्-जन् + क्त)–रोष (६.१) |
| मुखं | मुख (२.१) |
| दृष्ट्वैव | दृष्ट्वा (√दृश् + क्त्वा)–एव (अव्ययः) |
| मैथिलि | मैथिली (८.१) |
| विद्रवन्ति | विद्रवन्ति (√वि-द्रु लट् प्र.पु. बहु.) |
| परित्रस्ताः | परित्रस्त (√परि-त्रस् + क्त, १.३) |
| सुराः | सुर (१.३) |
| शक्रपुरोगमाः | शक्र–पुरोगम (१.३) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| म | म | सं | जा | त | रो | ष | स्य |
| मु | खं | दृ | ष्ट्वै | व | मै | थि | लि |
| वि | द्र | व | न्ति | प | रि | त्र | स्ताः |
| सु | राः | श | क्र | पु | रो | ग | माः |