तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं; सुपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम् ।
ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां; जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम् ॥
तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं; सुपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम् ।
ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां; जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम् ॥
अन्वयः
लङ्काधिपतिः lord of Lanka, नीलजीमूतनिकाशकायम् of colour like the dark bluish cloud, सुपाण्डुरोरस्कम् of fair chest, उदारवीर्यम् bold, शान्तम् made calm, अग्निदावमिव like the forest fire, तं जटायुषम् that Jatayu, पृथिव्याम् on the ground, ददर्श saw.M N Dutt
The lord of Lankā beheld Jațāyu, fallen on the ground, resembling sable clouds, having a yellow breast and of exceeding prowess, like to an extinguished forest-fire.Summary
Lord of Lanka saw that very bold Jatayu of dark blue colour of the cloud, fair chest, fallen on the ground, looking like the forest fire that had been put out.पदच्छेदः
| तं | तद् (२.१) |
| नीलजीमूतनिकाशकल्पं | नील–जीमूत–निकाश–कल्प (२.१) |
| सुपाण्डुरोरस्कम् | सु (अव्ययः)–पाण्डुर–उरस्क (२.१) |
| उदारवीर्यम् | उदार–वीर्य (२.१) |
| ददर्श | ददर्श (√दृश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| लङ्काधिपतिः | लङ्काधिपति (१.१) |
| पृथिव्यां | पृथिवी (७.१) |
| जटायुषं | जटायुष (२.१) |
| शान्तम् | शान्त (√शम् + क्त, २.१) |
| इवाग्निदावम् | इव (अव्ययः)–अग्नि–दाव (२.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तं | नी | ल | जी | मू | त | नि | का | श | क | ल्पं |
| सु | पा | ण्डु | रो | र | स्क | मु | दा | र | वी | र्यम् |
| द | द | र्श | ल | ङ्का | धि | प | तिः | पृ | थि | व्यां |
| ज | टा | यु | षं | शा | न्त | मि | वा | ग्नि | दा | वम् |