ततः शुभं तापसभोज्यमन्नं; स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम् ।
ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा; संध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य ॥
ततः शुभं तापसभोज्यमन्नं; स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम् ।
ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा; संध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य ॥
अन्वयः
ततः then, महात्मा the great sage, सुतीक्ष्णः Sutikshna, सन्ध्यानिवृत्तौ evening twilight had passed, रजनीम् night, ताभ्याम् to both of them, पुरुषर्षभाभ्याम् to both best of men, तापस भोज्यम् (योग्यम्) that which is fit for ascetics, अन्नम् food, सुसत्कृत्य with all hospitality, स्वयम् himself, ददौ presented.M N Dutt
Then, when the evening had passed away and night fell, Sutiksna, having done homage to those chiefs of men, offered them excellent fare, suitable to ascetics.Summary
Seeing that the evening had passed and night had set in, the great sage Sutikshna with due hospitality, served those best of men, food fit for ascetics.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे सप्तमस्सर्गः॥Thus ends the seventh sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| शुभं | शुभ (२.१) |
| तापसभोज्यम् | तापस–भोज्य (२.१) |
| अन्नं | अन्न (२.१) |
| स्वयं | स्वयम् (अव्ययः) |
| सुतीक्ष्णः | सुतीक्ष्ण (१.१) |
| पुरुषर्षभाभ्याम् | पुरुष–ऋषभ (४.२) |
| ताभ्यां | तद् (४.२) |
| सुसत्कृत्य | सुसत्कृत्य (अव्ययः) |
| ददौ | ददौ (√दा लिट् प्र.पु. एक.) |
| महात्मा | महात्मन् (१.१) |
| संध्यानिवृत्तौ | संध्या–निवृत्ति (७.१) |
| रजनीं | रजनी (२.१) |
| समीक्ष्य | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | शु | भं | ता | प | स | भो | ज्य | म | न्नं |
| स्व | यं | सु | ती | क्ष्णः | पु | रु | ष | र्ष | भा | भ्याम् |
| ता | भ्यां | सु | स | त्कृ | त्य | द | दौ | म | हा | त्मा |
| सं | ध्या | नि | वृ | त्तौ | र | ज | नीं | स | मी | क्ष्य |