मां प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण ।
अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च ।
संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान्सूर्य इवोदितः ॥
मां प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण ।
अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च ।
संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान्सूर्य इवोदितः ॥
अन्वयः
लक्ष्मण Lakshmana, माम् me, प्राप्य after attaining, गुणः merit, दोषः demerit, संवृत्तः been converted, पश्य see, शशिज्योत्स्नाम् light of the Moon, संहृत्यैव on effacing, उदितः risen, महान् mighty, सूर्यः Sun, इव like, तेजः glow, सर्वान् all, गुणान् qualities, संहृत्यैव effacing, अद्यैव now, सर्वभूतानाम् to all beings, रक्षसां च of demons, अभवाय for their extermination, प्रकाशते will shine forth.Summary
O Lakshmana even demerits turn into merits when they come in contact with me. Just as the Sun shines, effacing the moonlight, my brilliance will outshine my demerits of exterminating all (wicked) beings including the demons.पदच्छेदः
| मां | मद् (२.१) |
| प्राप्य | प्राप्य (√प्र-आप् + ल्यप्) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| गुणो | गुण (१.१) |
| दोषः | दोष (१.१) |
| संवृत्तः | संवृत्त (√सम्-वृत् + क्त, १.१) |
| पश्य | पश्य (√पश् लोट् म.पु. ) |
| लक्ष्मण | लक्ष्मण (८.१) |
| अद्यैव | अद्य (अव्ययः)–एव (अव्ययः) |
| सर्वभूतानां | सर्व–भूत (६.३) |
| रक्षसाम् | रक्षस् (६.३) |
| अभवाय | अभव (४.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| संहृत्यैव | संहृत्य (√सम्-हृ + ल्यप्)–एव (अव्ययः) |
| शशिज्योत्स्नां | शशिन्–ज्योत्स्ना (२.१) |
| महान् | महत् (१.१) |
| सूर्य | सूर्य (१.१) |
| इवोदितः | इव (अव्ययः)–उदित (√उत्-इ + क्त, १.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मां | प्रा | प्य | हि | गु | णो | दो | षः | सं | वृ | त्तः | प |
| श्य | ल | क्ष्म | ण | अ | द्यै | व | स | र्व | भू | ता | नां |
| र | क्ष | सा | म | भ | वा | य | च | सं | हृ | त्यै | व |
| श | शि | ज्यो | त्स्नां | म | हा | न्सू | र्य | इ | वो | दि | तः |