पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां; दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम् ।
सदेवगन्धर्वमनुष्य पन्नगं; जगत्सशैलं परिवर्तयाम्यहम् ॥
पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां; दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम् ।
सदेवगन्धर्वमनुष्य पन्नगं; जगत्सशैलं परिवर्तयाम्यहम् ॥
अन्वयः
चारुदंतीम् a lady with beautiful teeth, अनिन्दिताम् blemishless lady, मैथिलीम् Maithili, सीताम् Sita, पुरेव as earlier, अद्य now, मे my, न दिशन्ति यदि if they do not show me, अहम् I, सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगम् gods, gandharvas, men, serpents, सशैलम् mountain, जगत् world, परिवर्तयामि I will topsyturvy.Summary
I will topsyturvy this entire world including the gods, the gandharvas, human beings, serpents and mountains if they do not show me the princess from Mithila, who is blemishless and whose teeth are beautifulइत्यार्शे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकेय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे चतुष्षष्टिमस्सर्गः॥Thus ends the sixtyfourth sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| पुरेव | पुरा (अव्ययः)–इव (अव्ययः) |
| मे | मद् (६.१) |
| चारुदतीम् | चारुदत (२.१) |
| अनिन्दितां | अनिन्दित (२.१) |
| दिशन्ति | दिशन्ति (√दिश् लट् प्र.पु. बहु.) |
| सीतां | सीता (२.१) |
| यदि | यदि (अव्ययः) |
| नाद्य | न (अव्ययः)–अद्य (अव्ययः) |
| मैथिलीम् | मैथिली (२.१) |
| सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं | स (अव्ययः)–देव–गन्धर्व–मनुष्य–पन्नग (२.१) |
| जगत् | जगन्त् (२.१) |
| सशैलं | स (अव्ययः)–शैल (२.१) |
| परिवर्तयाम्य् | परिवर्तयामि (√परि-वर्तय् लट् उ.पु. ) |
| अहम् | मद् (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रे | व | मे | चा | रु | द | ती | म | नि | न्दि | तां |
| दि | श | न्ति | सी | तां | य | दि | ना | द्य | मै | थि | लीम् |
| स | दे | व | ग | न्ध | र्व | म | नु | ष्य | प | न्न | गं |
| ज | ग | त्स | शै | लं | प | रि | व | र्त | या | म्य | हम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||