इत्युक्त्वाभ्यपतद्गृध्रं संधाय धनुषि क्षुरम् ।
क्रुद्धो रामः समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम् ॥
इत्युक्त्वाभ्यपतद्गृध्रं संधाय धनुषि क्षुरम् ।
क्रुद्धो रामः समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम् ॥
अन्वयः
रामः Rama, इति thus, उक्त्वा saying so, क्रुद्धः in anger, धनुषि on the bow, क्षुरम् sharp arrow, सन्धाय after fixing, समुद्रान्ताम् extending up to the sea, मेदिनीम् the earth, कम्पयन्निव as though shaking, गृध्रम् vulture, अभ्यपतत् fell upon.Summary
Having siad so, Rama took his bow, fixed the sharp arrow, and aimed at the vulture. The seabound earth trembled.पदच्छेदः
| इत्य् | इति (अव्ययः) |
| उक्त्वाभ्यपतद् | उक्त्वा (√वच् + क्त्वा)–अभ्यपतत् (√अभि-पत् लङ् प्र.पु. एक.) |
| गृध्रं | गृध्र (२.१) |
| संधाय | संधाय (√सम्-धा + ल्यप्) |
| धनुषि | धनुस् (७.१) |
| क्षुरम् | क्षुर (२.१) |
| क्रुद्धो | क्रुद्ध (√क्रुध् + क्त, १.१) |
| रामः | राम (१.१) |
| समुद्रान्तां | समुद्र–अन्त (२.१) |
| चालयन्न् | चालयत् (√चालय् + शतृ, १.१) |
| इव | इव (अव्ययः) |
| मेदिनीम् | मेदिनी (२.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यु | क्त्वा | भ्य | प | त | द्गृ | ध्रं |
| सं | धा | य | ध | नु | षि | क्षु | रम् |
| क्रु | द्धो | रा | मः | स | मु | द्रा | न्तां |
| चा | ल | य | न्नि | व | मे | दि | नीम् |