निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं; तं गृध्रराजं परिरभ्य रामः ।
क्व मैथिलि प्राणसमा ममेति; विमुच्य वाचं निपपात भूमौ ॥
निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं; तं गृध्रराजं परिरभ्य रामः ।
क्व मैथिलि प्राणसमा ममेति; विमुच्य वाचं निपपात भूमौ ॥
अन्वयः
सः रामः that Rama, निकृत्तपक्षम् severed wings, रुधिरावसिक्तम् drenched in blood, गृध्रराजम् king of vultures, परिरभ्य hugging, मम my, प्राणसमा equal to my life, मैथिली Maithili, क्व where, इति this, वाचम् speaking, विमुच्य भूमौ leaving the ground, निपपात fell down.Summary
Rama hugged the king of vultures with servered wings, drenched in blood and asking him where Sita who was as dear to him as his life was, he dropped him and fell down on the ground.इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे सप्तषष्टितमस्सर्गः॥Thus ends the sixtyseventh sarga of Aranyakanda of the holy Ramayana the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| निकृत्तपक्षं | निकृत्त (√नि-कृत् + क्त)–पक्ष (२.१) |
| रुधिरावसिक्तं | रुधिर–अवसिक्त (√अव-सिच् + क्त, २.१) |
| तं | तद् (२.१) |
| गृध्रराजं | गृध्र–राज (२.१) |
| परिरभ्य | परिरभ्य (√परि-रभ् + ल्यप्) |
| रामः | राम (१.१) |
| क्व | क्व (अव्ययः) |
| मैथिलि | मैथिली (८.१) |
| प्राणसमा | प्राण–सम (१.१) |
| ममेति | मद् (६.१)–इति (अव्ययः) |
| विमुच्य | विमुच्य (√वि-मुच् + ल्यप्) |
| वाचं | वाच् (२.१) |
| निपपात | निपपात (√नि-पत् लिट् प्र.पु. एक.) |
| भूमौ | भूमि (७.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | कृ | त्त | प | क्षं | रु | धि | रा | व | सि | क्तं |
| तं | गृ | ध्र | रा | जं | प | रि | र | भ्य | रा | मः |
| क्व | मै | थि | लि | प्रा | ण | स | मा | म | मे | ति |
| वि | मु | च्य | वा | चं | नि | प | पा | त | भू | मौ |