अन्वयः
एवम् in that way, उक्तः having been entreated, शक्रः Indra, मे to me, योजनम् one yojana, आयतौ long, बाहू two arms, प्रादात् he gave, मे to me, कुक्षौ in the stomach, तीक्ष्णदंष्ट्रम् with sharp teeth, आस्यं च mouth also, अकल्पयत् created.
Summary
Having been entreated, Indra created in me two long arms extending upto a yojana and set my mouth with sharp teeth in the stomach.
पदच्छेदः
| एवम् | एवम् (अव्ययः) |
| उक्तस् | उक्त (√वच् + क्त, १.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| मे | मद् (६.१) |
| शक्रो | शक्र (१.१) |
| बाहू | बाहु (२.२) |
| योजनम् | योजन (२.१) |
| आयतौ | आयत (√आ-यम् + क्त, २.२) |
| प्रादाद् | प्रादात् (√प्र-दा प्र.पु. एक.) |
| आस्यं | आस्य (√आस् + कृत्, २.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| मे | मद् (६.१) |
| कुक्षौ | कुक्षि (७.१) |
| तीक्ष्णदंष्ट्रम् | तीक्ष्ण–दंष्ट्र (२.१) |
| अकल्पयत् | अकल्पयत् (√कल्पय् लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| ए | व | मु | क्त | स्तु | मे | श | क्रो |
| बा | हू | यो | ज | न | मा | य | तौ |
| प्रा | दा | दा | स्यं | च | मे | कु | क्षौ |
| ती | क्ष्ण | दं | ष्ट्र | म | क | ल्प | यत् |